कोरबा जिले में एक ही परिवार के चार लोगों (मां, बेटा और दो बेटियां) ने एक साथ खुदकुशी करने की कोशिश की। पहले ताे चारों ने जहर खाया, फिर फंदे से लटककर जान देने की कोशिश की। उसमें भी कामयाबी न मिलने पर बहनों ने कुएं में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी। फैमिली ने ये कदम तंगहाली से परेशान होकर उठाया, जबकि वे एक करोड़पति खानदान से ताल्लुकात रखते हैं। जानें आखिर क्या है पूरा मामला…
परिवार को भरपेट खाना तक नसीब नहीं होता था
– कटघोरा के छुरी गांव में रविवार की रात लकवाग्रस्त (पैरालाइज) सरोज अग्रवाल के साथ उसकी 24 साल की बेटी रश्मि, 21 साल की रानू और 18 साल के बेटा शुभम (18) ने एक साथ सुसाइड की कोशिश की।
– उन्होंने पहले चूहामार दवा खाई। असर नहीं होने पर फंदे पर लटकने की कोशिश की। उसमें भी कामयाब नहीं हुए तो मां को खाट में छोड़कर बाड़ी के कुएं में छलांग लगा दी। घटना में दोनों बहनों की मौत हो गई।
– वहीं भाई को बचा लिया गया। मां भी बच गई। जांच में पता चला कि उनके दादा करोड़पति है, लेकिन सरोज के परिवार को भरपेट खाना तक नसीब नहीं होता था।
घटनाक्रम को इस तरह समझें
रात 10:00 बजे- तीनों बच्चों ने मां के साथ मिलकर सामूहिक आत्महत्या का इरादा बनाया। रात 10.15 बजे- घर में रखे चूहामार दवा की घोल बनाई। उसे एक साथ चारों पी गए।
रात 10.30 बजे- असर नहीं होने पर उन्होंने फांसी लगाने का इरादा बनाया। रात 10.35 बजे- सीढ़ी लगाकर फंदा तैयार किया। लेकिन फंदा सही नहीं बन पाया।
रात 10.45 बजे- मां को कमरे में छोड़कर वे कुएं के पास पहंंुचे। एक साथ पानी में छलांग लगाई। रात 10.46 बजे- पड़ोस के लोगों को कुएं में गिरने की आवाज सुनाई दी वे फूलचंद के घर पहुंचे।
रात 10.50 बजे- घर के अंदर लोग पहुंचे। बच्चे नहीं दिखे तो खोजबीन की गई। कुएं में बच्चे नजर आए। रात 10.55 बजे- रस्सी डालकर उन्हें बाहर निकाला गया। दोनों बच्चियों की मौत हो चुकी थी।
दादा का कहना- 6 हजार महीने करता था खर्च
– दरअसल 10 साल पहले सरोज के पति और बच्चों के पिता नवलचंद की मौत हो गई थी। जिसके बाद से सरोज और तीनों बच्चे दादा फूलचंद के साथ रहने लगे।
– उनका हॉलर-मिल, जमीन-जायदाद और बैंक में लाखों रुपए जमा है। इतने अमीर होने के बाद भी फूलचंद पाई-पाई के कंजूस हैं।
– उनकी इसी कंजूसी से बच्चों को न तो सुख-सुविधा मिल रही थी और न ही भरपेट खाना। फूलचंद के सख्त बर्ताव से समाज के लोग भी चुप रहते थे।
– बच्चों की आजादी छिन चुकी थी। न तो उन्हें कोई काम करने दिया जाता था और न ही दूसरों से मिलने। सरोज व उनके बच्चे तंगहाली से जूझते हुए परेशानी भरी जिंदगी जी रहे थे।
– मां सरोज जब तक ठीक थी, तब तक उसने आटा चक्की से होने वाली कमाई को जोड़कर तीनों बच्चों को पढ़ाया। चोरी छिपे उन्हें सुविधाएं मुहैय्या कराई।
– दोनों बेटियों ने ग्रेजुएशन पूरा किया, वहीं शुभम ने स्कूल की पढ़ाई, लेकिन 3 साल पहले मां के लकवाग्रस्त होते ही ये बच्चे पूरी तरह दादा के भरोसे हो गए।
– दादा फूलचंद से मामले पर बात करने पर उन्होंने कहा कि उन्हें कमाने की क्या जरूरत, मैं तो हर महीने उन पर 6 हजार रुपए खर्च करता हूं, जबकि उनके कमरों को देखकर लगता है कि वे जरूरी सुविधाओं से दूर थे।

Masti Wale

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